सवेरा हो रहा था। सूर्य आसमान को चीरता ऊपर उड़ने की कोशिश कर रहा था, कोहरा धीरे-धीरे हट रहा था। चिड़ियों के चहकने की आवाज़ चारों ओर महक रही थी। एक आवाज़ सुनाई दी। वह आवाज़ दूध वाले की साइकिल की घंटी की आवाज़ थी। वह ट्रिन-ट्रिन बजाकर लोगों को अपने-अपने घरों से बाहर बुला रहा था। कोई अपनी बालकनी में सूर्य नमस्कार कर रहा था, कोई कपड़े सुखा रहा था, बच्चे स्कूल जा रहे थे और कोई अखबार का इंतज़ार कर रहा था। तभी अखबार वाला आया और हमेशा की तरह अखबार को अखबार की तरह नहीं, एक क्रिकेट की बॉल की तरह फेंका और इंतज़ार करने वाले यानी कि हमारे गोपाल जी का इंतज़ार ख़त्म किया। गोपाल जी को अखबार बॉल जैसे ही लगा, वह चिल्लाने लगे,
“कौन है! कौन है! तुम बच्चों को कितनी बार कहा है कि यहाँ क्रिकेट मत खेलो, पर तुम लोगों को समझ ही नहीं आता! तुम लोगों को बॉल नहीं मिलेगी… भागो यहाँ से, भागो!”
गोपाल जी को लगता था कि उन्हें चश्मे के बिना कम दिखता है। पर उन्हें दिखता ही नहीं था। वह बॉल को ढूंढने लगे, उनके हाथों में अखबार लग गया तभी दूध वाले ने कहा,
“बापूजी, वह अख़बार वाला था। हमेशा की तरह आपके हाथ में नहीं दिया, अख़बार फेंक कर चला गया। आपको लगा तो नहीं?”
गोपाल जी यह सुनकर चौंक गए और नाटक करने लगे,
“अरे! मेरा चश्मा… चश्मा कहाँ है? लगता है अंदर भूल गया हूँ।”
“अरे बापूजी, आपको लगा तो नहीं?”
गोपाल जी थोड़ा गुस्सा हो गए,
“अरे मुझे थोड़ी लगेगा, आने दो कल अखबारवाले को हमेशा कहा है कि अखबार हाथ में दिया कर। पर मानता ही नहीं है कानों में पता नहीं कौन सी रुई लगा कर आता है साला सुनता ही नहीं है, कितनी बार कहा है।”
तभी बिल्ली की म्याऊँ-म्याऊँ की आवाज़ आई। यह बिल्ली किसी की पालतू नहीं थी। यह हर घर जा सकती थी। यह जिस घर में जाती थी, उस घर में चूहों की निशानी भी नहीं रहती थी। यह बिल्ली गोपाल जी को पसंद थी और इस बिल्ली को वह प्यार से मोनी कहते थे। वह जब भी आती थी, गोपाल जी खुश हो जाते थे जैसे कि उनका कोई परिवार वाला आ गया हो। क्योंकि वह अकेले रहते थे, गोपाल जी दूध वाले से कहते हैं,
“अरे दूध वाले! थोड़ा दूध देकर जा, मोनी आ गई है।”
“अरे बापूजी! उतना ही लीटर दूध लेकर आता हूँ जितना मेरे ग्राहकों को चाहिए। अगर आपको दे दिया तो…”
“ऐसे कैसे? मैंने थोड़ा-सा दूध देने को कहा है! और तुम हो कि बेज़ुबान जानवर को दूध देना नहीं चाहते?”
वह सोचने लगा कि देना चाहिए कि नहीं, उतने में ही गोपाल जी उसे रुकने का कहकर घर में चले गए। वह बाहर आए एक गिलास में पानी लेकर और दूसरे हाथ में खाली तपेली लेकर। दूध वाला देख कर कहता है,
“बापूजी, यह क्या! मैं यह काम नहीं कर सकता।”
“अरे, बेज़ुबान जानवर को दूध पिला दोगे तो कौन-सा आसमान टूट पड़ेगा? ऊपर से तुम्हें पुण्य मिलेगा! और मैं तुम्हारी मदद कर रहा हूँ, पर तुम हो कि…”
“पर बापूजी, यह तो मेरे ग्राहकों के साथ धोखा होगा! मैं ऐसा…”
“अरे! क्या धोखा होगा? तुम हो कि बात का बतंगड़ बना रहे हो यार! तुम्हें बस इस कटोरी में दूध देना है और यह गिलास का पानी तुम्हारे दूध की केतली में मिलाना है। इतना आसान है यह करना, पर तुम हो कि… किसी को पता भी नहीं चलेगा!”
“पर बापूजी…”
“यह पर-पर छोड़ो! यानी कि तुम अपने दूध में पहले से ही मिलावट कर देते हो? और अगर तुम सिर्फ़ एक गिलास पानी मिला दोगे, तो तुम्हारी चोरी पकड़ी जाएगी… है ना?”
“बापूजी! मैंने आज तक एक बूंद की मिलावट नहीं की, और आप हैं कि…”
गोपाल जी ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। हार मान कर दूध वाला गोपाल जी की बातों में आ गया। और उसने अपना दूध कटोरी में दे दिया और पानी अपने दूध में मिला दिया। गोपाल जी दूध लेकर घर के अंदर जाने लगे और उनके पीछे-पीछे बिल्ली भी, उतने में दूध वाला कहता है,
“बापूजी, इसके पैसे?”
“इसके कैसे पैसे? मैंने तो तुम्हें पुण्य कमाने में मदद की! ऊपर से मैंने तुम्हें एक गिलास पानी दिया, जिससे तुम्हारी चोरी पकड़ी न जाए… और तुम हो कि…”
दूध वाला कुछ न कुछ कहता चला गया। हर बार की तरह गोपाल जी की जीत हुई और गोपाल जी अपने घर में चले गए। मुझे लगता है कि गोपाल जी सोचते होंगे, नेकी कर दरिया में डाल नहीं, नेकी कर बटुए में डाल। दूध वाले का चेहरा कोई टूटे हुए खंडहर की तरह हो गया था। दूध वाला तो मदद करने आया था और खुद फँस गया क्योंकि यह थे हमारे गाँधी सोसाइटी के गोपाल जी। गोपाल जी इस सोसाइटी के सचिव यानी की सेक्रेटरी थे। वैसे तो गाँधी सोसाइटी हमारे गोपाल जी से पुरानी नहीं थी। यह गाँधी सोसाइटी जैसी दिखती थी, वैसी थी नहीं। बाहर की दीवारों पर नया पेंट किया था पर अंदर की तरफ वही चूने की लिपाई और उस चूने के सफ़ेद रंग पर पान की पिचकारी थी। अगर तुम दूर से देखते तो वही खून के दाग दिखते। अगर किसी के घर में झगड़े होते तो लोग अपना समय उसे देखने में निकाल देते, पर उसे रोकने कोई नहीं आता। यह थी गोपाल जी की गाँधी सोसाइटी।
घर का एक कमरा और उस कमरे में चूहे की चूँ-चूँ करने की आवाज़ें आ रही थीं। चूहा कभी किताबों में जा रहा था, कभी पुराने बर्तनों में घुस रहा था। तभी चूहा एक पलंग से लटकती चादर पर लपक के पलंग पर चढ़ गया। उस चादर के अंदर घुस गया और पैर की सबसे छोटी उँगली पर काट लिया। अश्विन मौर्या नींद से जाग गया। और ज़ोर से चिल्लाया,
“आआआआआ……!”
अश्विन मौर्या को गाँधी सोसाइटी में आए दो महीने हो गए थे। यह घर उसके मामा का था जो यह घर कब से छोड़ चुके थे, और कोई अच्छी जगह पर जा चुके थे। अश्विन मौर्या इस शहर में दो महीने पहले आया तो था नौकरी का सपना लेकर, पर उसे क्या पता था सपने इतने जल्दी सच नहीं होते। अश्विन मौर्या काबिल तो था पर उसके रिश्ते नहीं थे यहाँ। यहाँ जान-पहचान के सामने काबिलियत नहीं देखी जाती थी।
जो सूर्य आसमान को चीरता ऊपर आया था, वह अब आसमान के बीच में रुक चुका था। दिन हो गया था। उसने चादर को हिलाया और चूहा दूर जाकर गिरा। वह ज़ोर से अंगड़ाई लेकर अपना बिस्तर समेटने लगा। वैसे तो उसकी सुबह अभी हुई थी। उसे अखबार पढ़ना पसंद था, और यह भी कह सकते हैं कि उन अखबारों के अंदर नौकरी के इश्तिहार पढ़ना कुछ ज्यादा ही पसंद थे। अश्विन मौर्या अखबार लेने के लिए दरवाज़े पर जाकर अखबार उठाता है। अखबार में से एक कागज़ गिरा। अश्विन मौर्या ने उसे उठाया और देख कर खुश हो गया। उसे जिस तरह की नौकरी चाहिए थी, उस तरह की नौकरी का विज्ञापन हाथ में लग गया था। वह पढ़ने लगा, उसे पता चला कि उसमें तारीख आज की थी। उसने समय देखा, उसमें समय ग्यारह से दिन के एक बजे तक का था। वह अपनी हाथ वाली घड़ी ढूँढने लगा। उसके घर में कोई भी दीवार घड़ी नहीं थी। उसने पूरा घर तहस-नहस कर दिया पर उसे घड़ी नहीं मिली। उसे याद आया कि उसकी सोसाइटी के दरवाज़े पर एक घड़ी लगी है, वह उसे देखने के लिए अपनी खिड़की के पास आया और खिड़की को खोला। उसने देखा कि उस घड़ी में समय बारह पच्चीस हो गया था। वह अंदर जाकर तैयार होने लगा। उसने अपनी फाइल को एक और बार देखा, यह सब करने में बारह मिनट गुज़र गए। वह सोचने लगा कि वह पन्द्रह मिनट में पहुँच जाएगा, तो वह पाँच मिनट गणेशजी के सामने आँखें बंद करके प्रार्थना करने लगा। वह सोचने लगा कि उसे यह नौकरी भगवान ने दी है और देने के लिए चूहे को भेजा था। उसने एक रोटी का टुकड़ा उस चूहे के लिए निकाल कर रख दिया और चला गया। उसने अपने घर का दरवाज़ा बंद किया पर अपनी खिड़की बंद करना भूल गया था। वह सोसाइटी का दरवाज़ा पार करने जा रहा था, तब उसका रास्ता बिल्ली ने काट दिया। यह बिल्ली किसी और की नहीं, गोपाल जी की थी। वह सोचने लगा और उसने एक पत्थर फेंक दिया उस तरफ और रास्ता पार कर लिया। उसे लगा कि वह बस से पन्द्रह मिनट में पहुँच जाएगा। वह बस का इंतज़ार करने लगा पर बस दो मिनट लेट आई। वह 18 मिनट में पहुँच गया। बड़े से ऑफिस को देख कर वह चौंक गया, बाहर देखा कि वहाँ टाइम आउट लिखा था। जिस समय पर उसे आना था, वह उसी समय पर आया था। उसने वहाँ खड़े चपरासी से पूछा,
“इतनी जल्दी इंटरव्यू ख़त्म हो गया?”
चपरासी ने उसे ध्यान से देखा,
“अरे बेटा! एक बजे ख़त्म होने का समय था, तो एक बजे ख़त्म हो गया।”
“पर अभी तो पाँच मिनट बाक़ी थे न?”
चपरासी ने उसे अपनी घड़ी दिखाई,
“अरे बेटा, यह देखो… अभी एक बजकर छे मिनट हो गए हैं!”
अश्विन मौर्या निराश हो गया था, और निराश होगा भी क्यों नहीं, यह नौकरी उसे सिर्फ पाँच मिनट लेट होने के कारण खोनी पड़ी थी। वह निराश होकर अपने घर की तरफ जाने लगा। उसने बस का इंतज़ार किया, बस आने में लेट हो गई। अश्विन मौर्या को गुस्सा आने लगा। जब बस आई तो उसने टिकट नहीं लिया। वह बिना टिकट लिए चढ़ गया और अपनी गाँधी सोसाइटी के सामने वाली सोसाइटी के बस स्टॉप पर उतर गया। वह सड़क पार कर के अपनी सोसाइटी पर आया और उसकी नज़र दरवाज़े पर लटकी उसी घड़ी पर गई। वह समझ गया कि घड़ी 5 मिनट पीछे थी। वह अगल-बगल में कुछ ढूँढने लगा जिससे वह चढ़ सके। पर उसे कुछ नहीं मिला, तभी उसकी नज़र घड़ी के नीचे एक कुर्सी पर गई। वह उस कुर्सी को नहीं ले सकता था क्योंकि उस पर हमारे गोपाल जी विराजमान थे। हाथ में छड़ी लिए, काला चश्मा पहने और सिर पर नेहरू टोपी लगाकर बड़े आराम से विराजमान थे हमारे गोपाल जी। अश्विन मौर्या गोपाल जी के पास गया और उनसे कहा,
“क्या आप मुझे यह कुर्सी दे सकते हैं? सिर्फ़ दो मिनट के लिए।”
“कौन हो तुम? इस सोसाइटी के तो नहीं लग रहे!”
“मैं इसी सोसाइटी का हूँ! आप मुझे यह कुर्सी देंगे? मैं आपको तुरंत वापस कर दूँगा।”
अश्विन मौर्या ने काफी शांति से कहा पर गोपाल जी ने थोड़ी सी भारी आवाज़ में कहा,
“क्या करना है तुम्हें इस कुर्सी का?”
“मुझे इस दरवाज़े के ऊपर लटकी घड़ी का समय बदलना है, वह पाँच…”
गोपाल जी ने उसकी पूरी बात नहीं सुनी और पहले ही मुँह हिला दिया।
“मुझे ऐसा लगता है कि इस घड़ी का समय बदलने की कोई ज़रूरत नहीं है।”
“पर यह पाँच मिनट पीछे है और इसकी वजह से मैं लेट…”
गोपाल जी फिर से उसकी बात सुनने के बजाय अपनी बात बोलने लगे। ऐसा लग रहा था कि वह उसकी बात सुनना ही नहीं चाहते थे।
“यह पाँच मिनट पीछे नहीं है। इसमें सही टाइम डला है। कोई ज़रूरत नहीं है इसे छेड़ने की… जाओ यहाँ से, तुम जाओ!”
“मुझे लगता है कि आपको दिखता नहीं है, यह घड़ी पाँच मिनट पीछे है!”
“मुझे सभी चीज़ें साफ़-साफ़ दिखाई देती हैं! यह घड़ी पाँच मिनट पीछे हो या पाँच घंटे पीछे, तुम उसे नहीं बदल सकते। क्या पता तुमने उसे बिगाड़ दिया तो? यह आज़ादी से पुरानी घड़ी है।”
“आपका यह अधिकार नहीं है मुझे रोकने का। आप मुझे कुर्सी दो, मैं पढ़ा-लिखा हूँ। मुझे पता है कि क्या करना है।”
गोपाल जी गुस्सा हो गए,
“तुम्हें क्या लगता है कि मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ?”
“मैंने आपसे यह नहीं…”
उन्होंने फिर से पूरी बात नहीं सुनी,
“मुझे सब पता चलता है कि तुम क्या कहना चाहते हो! तुम जाओ यहाँ से, किसी और की कुर्सी ले लो… मैं नहीं देने वाला हूँ!”
तभी सोसाइटी में सब्जी बेचने वाली आई। गोपाल जी उसे देख कर गुस्सा हो गए और अपने पास बुला कर कहा,
“तुम्हें मैंने कितनी बार कहा है कि तुम्हें इस सोसाइटी में सब्ज़ियाँ बेचने नहीं आना! मैंने कहा है ना तुमसे?”
उसने अपनी भाषा में कहा,
“आज़ बताईं हमनी के, एह सोसाइटी में काहे ना आए? हमनी के ना तो बिगड़ल सब्ज़ी बेचेनी जा, ना कवनो चोरी कईले बानी जा!”
गोपाल जी को कुछ समझ नहीं आया। अश्विन मौर्या वहीं खड़ा था और यह सब देख रहा था। गोपाल जी सोचने लगे और बोले,
“क्या चोरी-सब्ज़ी लगा रखा है! तुम्हें मैंने कहा था कि यहाँ मत आया करो।”
“बापूजी, मैं कहना चाहती हूँ कि ना तो मैं ख़राब सब्ज़ी बेचती हूँ, और ना ही चोरी करती हूँ! तब भी आप मुझे यहाँ नहीं आने देना चाहते। वह रेखा जिस भी सोसाइटी में जाती है, वहाँ चोरी भी करती है और ख़राब सब्ज़ी भी बेचती है… मैं उसकी तरह तो नहीं हूँ!”
“तुम उससे भी ख़राब काम करती हो!”
“मैंने कौन-सा ख़राब काम किया?”
“तुम्हें नहीं पता? सोच लो अच्छे से!”
वह कुछ समय सोचने लगी, उसे कुछ याद नहीं आया तभी गोपाल जी बोले,
“ठीक है! मैं ही बोल देता हूँ… तुम इस सोसाइटी की सारी बातें दूसरी सोसाइटी में करती हो, हाँ या ना?”
“पर मैं…”
तभी गोपाल जी बोले,
“हाँ या ना में जवाब दो! ‘पर-पर मैं’ नहीं!”
“हाँ, पर इससे दिक़्क़त क्या है? कभी-कभी…”
“‘इससे दिक़्क़त क्या है!’ कितनी आसानी से कह दिया तुमने! तुम्हारे कारण हमारी सोसाइटी का नाम ख़राब हो रहा है और तुम्हें पता भी नहीं है!”
“जो मैंने देखा-सुना, वही मैंने कहा।”
“वही तुम्हारी ग़लती है! और इसी ग़लती के कारण तुम्हें मैं यहाँ नहीं आने दूंगा, भले ही मुझे रेखा को बुलाना पड़े!”
सब्जी वाली अश्विन मौर्या के पास आकर बोली,
“साहब, आप इन्हें समझाइए ना! मेरी बात तो सुन ही नहीं रहे… क्या पता आपकी बात समझ जाएँ!”
अश्विन मौर्या खुद परेशान था। वह अभी किसी की मदद नहीं करना चाहता था, तो उसने अपना मुँह हिला कर बता दिया कि वह कुछ नहीं कर सकता। सब्जी वाली चली गई। अश्विन मौर्या गोपाल जी के पास आकर बोला,
“बड़े अजीब हैं आप! अगर मैं इस घड़ी का समय सही कर दूँ, तो क्या पता किसी और का नुक़सान होने से बच जाए?”
“मुझे कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता! किसी का फ़ायदा हो या नुक़सान, मेरा इसमें क्या? और ऊपर से मैं इस सोसाइटी का सेक्रेटरी हूँ… जो मैं कहूँगा, वह तुम्हें करना होगा! यह कुर्सी मैं नहीं देने वाला।”
“तो यह आपका फ़र्ज़ था घड़ी में समय ठीक करने का, और आपने अपना फ़र्ज़ निभाया नहीं! और ऊपर से आप मुझे सुना रहे हैं?”
“क्या लगा रखा है फ़र्ज़-फ़र्ज़! तुम अकेले नहीं हो सोसाइटी में, बाक़ी लोग भी हैं। उन्होंने कभी शिकायत नहीं की, और तुम बड़े आए शिकायत करने वाले!”
अश्विन मौर्या ने धीमी आवाज़ में कहा,
“पूरी बात तो सुनते नहीं हैं, शिकायत कैसे सुनेंगे!”
“तुम कहना क्या चाहते हो?”
“यही कि शिकायत ऐसे इंसान के सामने की जाती है जो शिकायत सुन सके… और आप सुनते थोड़ी हैं, सिर्फ़ बोलते रहते हैं!”
गोपाल जी बड़ी आवाज़ में बोले,
“तुम्हें बड़ों से कैसे बात करनी चाहिए, यह सिखाया नहीं है क्या?”
“मुझे पता था आप यही बोलेंगे! मुझे सिखाया तो है, पर आप जैसे लोगों से कैसे बात करनी है, वह भी सिखाया है। आपसे मैंने कुर्सी क्या माँग ली, आप तो इतने लाल-पीले हो गए!”
“तुम कुछ भी बोल लो, अब तो मैं तुम्हें कुर्सी नहीं देने वाला! मैं यहीं धरना देकर बैठ गया हूँ, यह तुम मान लो!”
अश्विन मौर्या सोचने लगा। वह भी ज़िद पर उतर आया था कि इसी कुर्सी से चढ़ेगा। उसकी नज़र कुर्सी पर पड़ी, उसने कुर्सी को ध्यान से देखा तो उस पर ‘गाँधी सोसाइटी’ लिखा था। वह समझ गया कि यह कुर्सी गोपाल जी की नहीं, सोसाइटी की थी। उसने गोपाल जी से पूछा,
“क्या यह कुर्सी आपकी है?”
गोपाल जी ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। अश्विन मौर्या गुस्सा हो गया,
“मैं आपसे पूछ रहा हूँ, क्या यह कुर्सी आपकी है?”
“क्यों? क्या करना है? यह मेरी नहीं है, बोलो… क्या कर लोगे तुम? कर क्या लोगे?”
“मैं क्या करूँगा… यह कुर्सी सोसाइटी की है, तो यह आपको मुझे देनी होगी!”
“हाँ, तो मैं इस सोसाइटी का सेक्रेटरी हूँ! मैं इसका इस्तेमाल कर सकता हूँ, तुम इसमें कुछ नहीं बोल सकते।”
“सोसाइटी के सेक्रेटरी तो हो, पर काम नहीं करते! कचरा हर जगह, पान की पिचकारी हर जगह, और हर जगह पानी भरा हुआ है जिससे डेंगू होता है! आपको थोड़ी न दिखेगा यह सब… आपने तो काला चश्मा जो लगा रखा है, जैसे कोई न्याय की देवी हों!”
“यह सब किया किसने है? तुम लोगों ने ही ना! तो मैं साफ़ क्यों करूँ?”
“तो आप सेक्रेटरी बने ही क्यों, अगर आप काम ही नहीं करना चाहते?”
“सोच-समझकर बोलना! मैं इस कुर्सी पर बैठा हूँ, तुम्हें क्या? मैं यहाँ का सेक्रेटरी हूँ!”
“मैं समय पर मेंटेनेंस देता हूँ, इस कुर्सी पर मेरा भी अधिकार है! आपको मुझे यह देनी होगी, आप ऐसे तानाशाही नहीं कर सकते!”
“तुमने मुझे तानाशाह कहा न? मैं हूँ तानाशाह! जो करना है तुम कर लो, मैं नहीं दूँगा कुर्सी!”
अश्विन मौर्या गुस्सा हो गया। बिल्ली की म्याऊँ-म्याऊँ की आवाज़ आने लगी। गोपाल जी खुश हो गए। अश्विन मौर्या को यह याद आया कि बिल्ली ने उसका रास्ता काटा था। बिल्ली अश्विन मौर्या के पास आ गई। अश्विन मौर्या और भी गुस्सा हो गया। उसने गुस्से में बिल्ली को ज़ोर से लात मारी। बिल्ली दूर जाकर गिरी और ज़ोर से म्याऊँ-म्याऊँ करने लगी। गोपाल जी को गुस्सा आ गया, वह खड़े हो गए पर वह बिल्ली के पास नहीं गए। वह अपनी कुर्सी को पकड़ कर खड़े रहे, तभी अश्विन मौर्या को मौका मिल गया। उसने उनसे कुर्सी छीन ली और उस पर चढ़ने की कोशिश करने लगा। तभी कुर्सी का एक पाया लंगड़ाने लगा पर अश्विन मौर्या घड़ी को निकालने की कोशिश करता रहा। गोपाल जी उसे उतारने की कोशिश कर रहे थे। उसने दीवार को पकड़ कर घड़ी को उतारने की कोशिश की और घड़ी निकाल ली, तभी कुर्सी का पाया टूट गया। गोपाल जी पीछे की तरफ हट गए, अश्विन घड़ी के साथ नीचे गिरा और घड़ी टूट गई। अश्विन मौर्या गिरने के दर्द में था। तभी म्याऊँ-म्याऊँ की आवाज़ आई, बिल्ली अश्विन मौर्या के घर से चूहा मुँह में दबा कर बाहर आई और उसे खाने लगी। उस चूहे का खून बिल्ली के मुँह पर ऐसा लगा था जैसे अश्विन के गिरने की खुशी गोपाल जी के मुँह पर हो।